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उत्तराखंड को हिमालयन एक्शन रिसर्च सेंटर के संस्थापक डॉ महेंद्र सिंह कुँवर से भी कुछ सीख लेनी चाहिये

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दिलवर सिंह बिष्ट
रुद्रप्रयाग। ‘हिमालय टूट सकता है पर झुक नहीं सकता।’इसी दृढ इच्छा शक्ति और बिश्वास का नाम हैं डॉ महेंद्र सिंह कुँवर, हम न हिलेंगें और न डगमगाएंगे ।पहाड़ी हैं पहाड़ की तरह खड़े रहेंगे। हम से जो हो सकता हैं उसे हम अपने पहाड़ के भाई-बहनों व उत्तराखंड के विकास के लिये करेंगे , अगर हमारे अनुभवों की कही जरुरत पड़े तो पीछे नहीं हटेंगे ,उसमें भी शत प्रतिशत देंगे।हिमालयन एक्शन रिसर्च सेंटर का मकशद हैं उत्तराखण्ड के विकास रूपी पहिये को आगे बढ़ाना। पहाड़ में रह रहे लोगों को कैसे स्थानीय उत्पादों ,बागवानी, जंगली कंदमूल फलों ,फूलों को बढ़ावा दिया जाए इसके लिए हम इन्हें प्रेरित करना व सुझाव देना ,जो लोग हमारे पास आते हैं, उन्हें प्रशिक्षण प्रदान करना हमारा मूल मंत्र हैं ।

माँ के साथ डॉ महेंद्र सिंह कुँवर


डॉ महेंद्र सिंह कुँवर का जन्म चमोली जिले के कांसवा गांव में हुआ था ,ये वही कांसवा गांव है जो एक समय गढ़वाल के राजाओं की राजधानी थी। और कांसवा के कुंवर ही नंदा राज यात्रा के अधिष्ठाता भी हैं , कुंवर की प्रारंभिक शिक्षा पिथौरागढ़ व उच्च शिक्षा गोपेश्वर गढ़वाल में हुई। डॉ महेंद्र सिंह कुँवर को क्रिकेट का भी बड़ा शौक हैं , गोपेश्वर में चिपको आंदोलन के दौरान उनकी मुलाकात डॉ चंडी प्रसाद भट्ट से और धीरे-धीरे उनका मन पहाड़ में बस गया।यंही से शुरू हुई उनके जीवन की वह लड़ाई जिसे उन्होंने हिमालयन एक्शन रिसर्च सेंटर (हार्क) की स्थापना के साथ 1988 में शुरू किया था।

जैविक खेती

पहाड़ की माटी ,जैविक खेती,जल,जंगल,पर्यावरण,रोजगार ही उनका जैसे जीवन का मकशद बन गया ।आज भी उनका परिवार , पुत्र, बेटी, व पत्नी अलग-अलग शहरों में नौकरी व अध्यन कर रहे हैं वही डॉ महेंद्र सिंह कुँवर अपनी 86 साल की माँ के साथ देहरादून में रहते हैं उनकी खुद की उम्र 63 साल हैं।कहते हैं मां आज भी मुझे वैसे ही डांटती है जैसे बचपन में डांटती थी। सिर्फ गाल पर नहीं मारती।मेरी एक ही अभिलाषा हैं अपनी मातृभूमि, उत्तराखंड को अपने रीति रिवाजो,खान-पान,रहन -सहन,पौराणिक संस्कृति को अपने पहाड़ी भाई बहनों के सहयोग से जीवंत व संजोये रखना हैं। जिसके लिए में व मेरी टीम निरंतर प्रयास कर रहे हैं।

आधुनिक प्रजाति के सेब

हमारा मकसद पहाड़ में पैदा हुए कोदा,झंगोरा,काफल ,बुराँश,कोणी,भट्ट,भंगजीरा, जख्या ,लाल चावल स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देकर अपनी आजीविका के साथ-साथ आर्थिकी से भी मजबूत बनाना है।देश और दुनिया को भी जगाना है, कि हमारे पहाड़ी जंगली फल फूलों में व स्थानीय अनाजों में कितनी पोष्टिकता है और कितने यह औषधीय गुण है।

बागवानी

हिमालयन एक्शन रिसर्च सेंटर के संस्थापक डॉ महेंद्र सिंह कुँवर व यूसेक के निदेशक डॉ महेन्द्र प्रताप सिंह बिष्ट ने कहा कि हम देवभूमि के लोग है ,हमे ईश्वर ने क्या नही दिया है, लेकिन हम प्रकृति के उस उपहार को आज तक नहीं जान सके हैं , इसलिए हमें इसका पूरा लाभ नहीं मिल पाया।आज परिस्थिति बदल गई है,अब हम देवभूमि में पैदा होने वाली औषधियों, कंदमूल फल,फूल के 12 स्थानीय किस्मो के औषधीय गुणों से युक्त अनाजों के बारे में जान चुके हैं, और लोगों को इससे होने वाले लाभ की जानकारी व इन्हे उगाने के लिए भी प्रेरित कर रहे हैं।हिमालयन एक्शन रिसर्च सेंटर आज उन्ही नाना प्रकार की औषधीय गुणों से युक्त बस्तुओं को खाद्य सामाग्री बनाकर बेच रही हैं। आने वाले समय मे सकारात्मक परिणाम भी दिखाई पड़ेंगे।

डॉ महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट

डॉ महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट का कहना है कि भले मेरा यह क्षेत्र नही है, लेकिन स्थानीय अनाजों व जंगली कंदमूल फल-फूलों से बने शुद्ध विभिन्न खाद्य सामाग्री का सेवन में खुद भी करता  हूँ ।डॉ महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट की पत्नी डॉ नीलम बिष्ट पौडी जनपद के कोट ब्लॉक में राजकीय प्राथमिक विद्यालय स्वाडु में शिक्षिका हैं और समय-समय पर अनाजों का भंडारण कर छुटियों में देहरादून स्थित अपने आवास पर उनके साथ एक्सपेरिमेंट करती है।अपने स्थानीय खाद्य उत्पादों से कभी बिस्किट,मोमो,नोडल,केक गुजिया,समोसे बनाकर खिलाने के साथ बच्चों को भी इसके पोष्टिकता के साथ इसमें पाये जाने वाले औषधीय गुणों के बारे में उन्हें जानकारी भी देती है।डॉ महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट का कहना हैं कि में इसलिये इसके बारे में थोड़ी बहुत जानकारी रखता हूँ इसलिए अपने नजदीकी किसान मित्रों ,सगे संबंधियों को इनकी खेतीकर अपनी आजीविका व आर्थिकी के साथ इसमें पाये जाने वाले औषधीय गुणों के बारे में भी जितना हो सके जानकारी देता रहता हूं।

प्रयोगशाला

यह सच है कि पलायन को रोकना व घर बैठे रोजगार प्राप्त करना है तो परम्परागत कृषि को अपनाना होगा, और साथ ही सरकार को 40 वर्षो से कृषि के क्षेत्र में कार्य कर रहे डॉ महेंद्र सिंह कुँवर जैसे लोगों का सहयोग लेना होगा।जिससे आधुनिक व पौराणिक कृषि के तौर तरीकों का आपस मे समावेश हो और कास्तकारों व सरकार को  इसका भरपूर लाभ मिल सके।

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