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उत्तराखंड पलायन आयोग के कौटिल्य का नया अर्थशास्त्र

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अगर शहरों से पलायन कर गए लोग वापस नहीं जाते हैं, तो वे प्रदेश की अर्थव्यवस्था में कुछ न कुछ तो योगदान करेंगे, क्या उनकी उपयोगिता जीरो हो जाएगी ?

राकेश डंडरियाल

उत्तराखंड पलायन आयोग ने महज 17 ,801 लोगों के कारण उत्तराखंड में प्रति व्यक्ति आय में कमी का आकलन किया हैं, जो समझ से परे हैं । उत्तराखंड आर्थिक सर्वेक्षण 2019—20 के मुताबिक बर्ष 2018- 19 में राज्य की प्रति व्यक्ति आय 1,98,738 रुपये वार्षिक (16,561 रुपये मासिक) रही है। किन आकड़ों के आधार पर पलायन आयोग ने कहा कि रिवर्स पलायन के बाद पहाड़ में प्रतिव्यक्ति आय में कमी आ सकती है यह कल्पना से परे हैं ।आईए पहले एक नजर आयोग के आकड़ों पर डालते हैं। अपनी ने नौ पन्नो की रिपोर्ट में आयोग ने उस रिपोर्ट को आधार बनाया हैं जो रिपोर्ट जिलों से आई हैं जिसमें कोरोना के चलते किस जिले में कितने लोग वापस आये हैं का जिक्र हैं। किस प्रकार के लोग वापस आये हैं यह भी जान लीजिये ,होटलो , रेस्टोरेंटो , छात्र , अवं छोटे व्यापारी, कुल संख्या 59360 जिनमें से केवल 17 ,801 वापस नहीं जाना चाहते हैं।

14 अप्रैल 2020 को प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने उत्तराखंड पलायन आयोग से कोरोना संक्रमण के कारण हुए रिवर्स पलायन पर एक बिस्तृत अध्ययन रिपोर्ट की मांग की । जिसमें उन्होंने कहा कि जो लोग गांव वापस लौटे रहे हैं उन्हें किस तरीके से पहाड़ में रोका जाय। जाहिर तौर पर इसे मुख्यमंत्री की सकारात्मक सोच माना जाना चाहिए ,जिसके बाद पलायन आयोग ने इस पर माथा पच्छी की होगी , तुरंत फुरंत में आकड़े जुटाए होंगे , जिसके बाद एक हफ्ते में ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग की ओर से रिवर्स पलायन को लेकर सरकार को रिपोर्ट सौप दी गई।

शायद उत्तराखंड के इतिहास में यह एक रिकॉर्ड होगा जो पलायन आयोग ने स्थापित किया हैं ।इस इतिहास में बताया गया हैं कि कोरोना संकट के बाद उत्तराखंड के 10 पर्वतीय जिलों में 59360 प्रवासी वापस अपने गांव आए हैं। 65 फीसद देश के बिभिन्न राज्यों से 30 फीसद उत्तराखंड के प्रमुख शहरों से , पांच फीसद लोग विदेश से लौटे हैं।

आयोग ने आकड़ों में यह भी हिसाब किताब लगा लिया हैं कि 30 फीसद लोग अब वापस नहीं जाना चाहते हैं। यही से पलायन आयोग पर सवाल खड़े होते हैं, हालाँकि पहले पलायन आयोग का पक्ष रखना जरुरी हैं ताकि उन्हें इस रिपोर्ट पर सवाल उठाने का मौका ना मिल सके। पलायन आयोग का कहना हैं कि उसने तथा ग्राम्य विकास बिभाग ने जिला स्तरीय अधिकारियों के माध्यम से इन 59360 लोगों से जानकारी जुटाई। साथ ही प्रवासियों से फोन, ई-मेल, वाट्सएप के जरिये संपर्क किया गया। फिर रिपोर्ट तैयार की गई। यानि मोटे तौर पर देखा जाय तो लगभग दस हजार लोगों से एक दिन में संपर्क किया गया , जिसका रिजल्ट रहा 18 हजार लोग पहाड़ में ही अपना रोजगार करना चाहते हैं या खेती बाड़ी करना चाहते हैं।

अब समझिये उत्तराखंड का भूगोल
भौगोलिक रूप से उत्तराखंड के पहाड़ी जिले बिषम परिस्थितियों के लिए जाने जाते हैं , एसएस नेगी जो उत्तराखंड पलायन आयोग के एक्सपर्ट कौटिल्य हैं उन्हें बताना चाहिए कि क्या यह संभव हैं कि पूरा प्रदेश बंद हो और महज एक हफ्ते में सर्वे पूरा कर दिया गया। पलायन आयोग की फीडबैक का माध्यम ई-मेल, वाट्सएप था, तो क्या होटल व मजदूरी करने वाले लोग ई-मेल, वाट्सएप पर आसानी से मिल गए ?
कहाँ है वह प्रारूप जिसके माध्यम से उन्होंने सर्वे करवाया ?
महज 18 हजार लोगों के पहाड़ में रुकने से पर कैपिटा इनकम घटने का उनका तर्क किस आर्थिक ढांचे पर आधारित हैं ?

वर्ष 2017 में बने पलायन आयोग का मुख्यालय गढ़वाल मंडल मुख्यालय पौड़ी में बनाया गया , मुख्यमंत्री स्वयं इसके अध्यक्ष हैं। एसएस नेगी जिनका अर्थशास्त्र से कुछ भी लेना देना नहीं हैं उन्हें इसका उपाध्यक्ष बनाया , जिसके बाद एक साल के अंदर ही इनका खुद भी पलायन पौड़ी से देहरादून हो गया।

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