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कोका-कोला एवं इंडो-डच हॉर्टिकल्चर कम्पनी की अनूठी पहल, उत्तरकाशी में लगाए सौ से अधिक सेब बागान

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कोका-कोला एवं इंडो-डच हॉर्टिकल्चर कम्पनी की अनूठी पहल, उत्तरकाशी में लगाए सौ से अधिक सेब बागान

देहरादून- कोका-कोला एवं इंडो डचहार्टिकल्चर कम्पनी के सयुक्त प्रयास से उत्तरकाशी में एक सौ से अधिक सेब के बगीचे तैयार किये गये हैं । रूट सटाक पर आधारित सेब के सघन बगीचे लगाने के लिए इन दिनों इटली से रूट सटाक सेब के एक्सपर्ट फलोरियन इन दिनों उत्तरकाशी में डेरा डाले हुए हैं। विटा फ्रुट कम्पनी इटली से इडो डच हार्टिकल्चर के पाटनर हैं ।

रूट सटाक सेब की प्रजाति शीघ्र तथा अधिक फल लेने के लिए जानी जाती हैं । विदेशों में खासकर अमेरिका के वैज्ञानिकों द्वारा रूट सटाक एम 6,एम116,एम111तथा आधुनिक जिनेवा सीरीज़ के रूप में जी202,जी 202,जी16,जी 41सहित रोग रोधक क्षमता वाली प्रजातियों विकसित की है । फलोरियन ने कहा कि एम 9व एम111 को पानी वाली जगह पर लगाना चाहिए ।


उन्होंने बताया कि जहाँ पहले एक एकड़ में 100 पेड लगाये जाते हैं वहीं नयी विधि से अब 1000 से 1200 पौधे लगाये जा सकते हैं ।मजेदार बाद यह है कि इनमें प्रथम वर्ष से ही फल प्राप्त होने लगते हैं । पारम्परिक विधि से जहाँ 4000 से 6000 किलो अधिकतम फल पैदा होता है वही नयी विधि से 20000 से 25000 किलो फल प्राप्त किये जा सकते हैं । नालियों में पोधे 1मीटर की दूरी पर लगाये जाने चाहिए तथा लाईन से लाईन की दूरी तीन मीटर होनी चाहिए ।

बागवानों ने फफूदीरोग,सफेद चूर्ण चूर्ण रोग यानी पेड के पते सफेद होना ,कैकर, माईट व जडो का सडना या गलना के बारे में जानकारी ली ।फलोरियन ने कहा कि फफूदी के लिए मेकाजेब डायथेन एम45 3ग्राम प्रति लिटर का घोल बनाकर छिड़काव करे।सफेद चूर्ण के लिए केराथिन एक ग्राम प्रति लिटर ,कैकर के लिए एक लिटर अलसी के तेल में 2 ग्राम कापर आकसीकलोराइड तथा सौ ग्राम सिन्दूर का घोल बनाकर घाव पर ब्रुश से लगाये । माइट के लिए वरटीमैकस दो ग्राम प्रति लीटर पाशी में घोल का सप्रे करे ।जड़ो का सजना व गलना पर दस लीटर पानी में 40 ग्राम बलाईटाकस तथा 20ग्राम कलोरोपायरीफाकस मिला कर प्रत्येक पौधे की जड में 1/2लीटर पानी डालने यह रोग रूक जाता है।उनहोंने ने आराकोट के कास्टा में इस वर्ष फरवरी मार्च में लगाये गये पौधों का निरिक्षण भी किया तथा वहा पर लगे रोग की बागवानों को जानकारी दी ।तथा उसका उपचार भी बताया वहाँ लगे फल भी बागवानों को बताया ।

उन्होंने ने कहा कि 40से 42डिग्री तापमान पर यह प्रजाति लगायी जाती है । इस अवसर पर उनके साथ डा सुधीर चड्ढा, इंडो डच हार्टिकल्चर के निदेशक तथा गोबिन्द सिह झोपटा हिमाचल प्रदेश के हार्टिकल्चर विकास प्रोजेक्ट के सहायक निदेशककम टेकनीकल टीम लीडर भी थे ।बागवानों में किशोर राणा आराकोट किसान सिंह, राजपाल राणा, कुशल सिंह, सोहन लाल, बचन सिंह, डा कमल चौहान किशोर राणा ईशाली, मोहन लाल व मनु राणा सहित दर्जनो बागवान उपस्थित थे ।

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