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चमोली के डिजिटल विलेज घेस गांव पर आखिर किसकी नजर लगी ? चमोली से सुभाष पिमोली की ख़ास रिपोर्ट ।

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22 अप्रैल 2018 को मुख्यमत्री त्रिवेंद्र सिंह ने घोषणा की , जनपद चमोली के अंतिम गांव घेस को डिजिटल गांव बना दिया गया हैं । घेस जैसे दूरस्थ व सीमावर्ती गांव को डिजिटल विलेज तो बना दिया गया, और टेली-मेडिसिन द्वारा अपोलो अस्पताल से जोड़ा भी गया , लेकिन सपने अभी भी अधूरे हैं , सपने देखने में महज अच्छे हो सकते है लेकिन हकीकत से कोषों दूर होते है । यही हालत डिजिटल गांव घेस की हैं ।

उत्तराखंड के अधिकारी आयुष गांव घेस में मुख्यमंत्री की ड्रीम योजना वाई- फाई चौपाल को किस तरह से पलीता लगा रहे हैं उसका जीता जागता नमूना देखना हो तो आइये आपको ले चलते हैं देश के अंतिम गांव घेस। यहाँ टेलीफोन व वाई फाई के लिए भारी भरकम तामझाम तो लगा दिया गया लेकिन नतीजा ज़ीरो है।वाई फाई चौपाल के उपकरणो की देखभाल करने वाला कोई नहीं ।

आखिर कौन है जो मुख्यमंत्री की घोषणाओं,पर लगा रहा है पलीता ?

सुभाष पिमोली
चमोली /थराली।चमोली जिले का अंतिम आयुष गांव घेस गत वर्षों से लगातार मटर व जड़ीबूटी की खेती के लिये प्रसिद्ध होने के साथ ही डिजिटल इंडिया के तहत वाई फाई चौपाल योजना से जुड़ा गांव था।जिसे अब डिजिटल गांव के नाम से भी जाना जाने लगा है।लेकिन आज यहाँ सभी योजनायें दम तोड़ती हुई नजर आ रही है।

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने सीमांत गांवों में बसे लोगों को 21 वीं सदी में डिजिटल इंडिया को बढ़ावा देने व इससे जोड़ने को लेकर एक वाई फाई चौपाल योजना का 2018 के अंतर्गत चमोली जिले के सीमांत आयुष गांव घेस,हिमनी ,ब्लाण्ड गांव की पच्चीस सौ के लगभग आबादी व क्षेत्र में मटर, जडीबुटी की खेती को देखते हुए वहां बैलून टॉवर लगा कर संचार क्रांति में एक सराहनीय पहल कर इन गांवों में इंटरनेट सुविधा शुरू की थी।जो फिलहाल घेस में दम तोड़ती नजर आ रही है।

 

हिमनी गांव के बलवंत सिंह, नरेंद्र सिंह, युवक मंगल दल अध्यक्ष ब्लाण्ड बलवंत नेगी ,पूर्व प्रधान रूप सिंह, गोपाल सिंह दानु, राजेन्द्र सिंह का कहना है कि आज आलम यह है कि गांव में लगे वाई फाई टावर और सेटअप फिलहाल महज शो पीस बनकर रह गए हैं । गांव में अब हालत यह हैं कि लोगों को कॉल करने के लिए तीन किलोमीटर दूर अन्यत्र स्थान जाना पड़ रहा है। ताकि दूर प्रदेशों में रह रहे अपनों से सुख-दुख की बातें हो सके।

ग्रामीण बताते हैं कि शुरुवाती दौर में जरूर इंटरनेट चला लेकिन कुछ महीनों के बाद से वाई फाई की कनेक्टिविटी गायब होने लगी । ग्रामीणों का कहना है कि सूबे के मुख्यमंत्री ने घेस गांव को अपोलो अस्पताल से जोड़ने की कवायद शुरू की है, लेकिन बिना इंटरनेट और कॉलिंग सुविधा के कैसे घेस गांव में टेलीमेडिसिन जैसी सुविधा मिल पाएगी।

आखिर घेस के ग्रामीण अपोलो अस्पताल के डॉक्टरों से कैसे जुड़ पायेंगे।ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री की वाई फाई योजना की सराहना तो की, लेकिन साथ ही बताया कि वाई फाई योजना पर खर्च करने के बजाय बेहतर होता किसी टेलीकॉम कंपनी का एक मोबाइल टॉवर गांव में लगा दिया जाता, तो कई क्षेत्रों के लोग वॉइस काल और वीडियो कॉल दोनों का लाभ ले सकते थे।

आयुष गांव घेस में वाई फाई योजना की दम तोड़ने की एक बड़ी वजह ये है कि यहां वाई फाई चौपाल के संसाधनों की देखरेख करने वाला कोई नही है ,नतीजन कभी वाई फाई के एंटीना से छेड़छाड़ तो कभी बैटरियां ही गुम या खराब हो जा रही हैं। जिसके चलते ग्रामीण इंटरनेट की दुनिया से महरूम रह जाते हैं ,देखरेख के अभाव में घेस में न ही ई क्लासेस का सपना साकार हो पा रहा है और न ही डिजिटल विलेज बनाने की मुहिम को गति मिल रही है।

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