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पलायन कर गए लोगों के लिए उदाहरण हैं सुखदेव पंत

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सुखदेव के बगीचे में आम से लेकर आड़ू ताइवानी आड़ू ,खुमानी, नारंगी, अंजीर,कीवी और अमेरिकन आबोकाडो के फलदार वृक्ष हैं

दिलवर सिंह बिष्ट

रुद्रप्रयाग। में अपनी जन्मभूमि को नहीं छोडूंगा अपने जीते जी चाहे कोई परिवार का सदस्य क्यों न मुझे छोड़ दे, जिसे जहाँ जाना है जाए , में अपनी जन्मभूमि उतराखण्ड को नहीं छोडूंगा । शुद्ध हवा , पानी , खाने के लिए जैविक आनाज , और सबसे बड़ा मेरे लिए मेरा गांव जहाँ में बचपन से पला बढ़ा ,उसे कैसे छोड़ दूं । ये शब्द हैं रुद्रप्रयाग जिले के विकासखण्ड जखोली के सुदूरवर्ती ग्राम स्यांरी ग्रामसभा भ्योन्ता न्यायपंचायत सोरांखाल भरदार पट्टी निवासी सुखदेव पंत(54 वर्षीय)के।


सुखदेव कहते है कि देखने सुनने में उनके गांव की जनसंख्या 500 से ऊपर हैं ,मकान भी 150 सौ,से ऊपर है लेकिन अगर सब लोगों को जोड़ दिया जाए तो पूरे गांव में बूढ़े जवान मिलाकर 60 से 65 लोग ही रहते हैं। गांव में मुख्य रूप से पंत,भट्ट,जोशी और कुछेक परिवार अनुसूचित जाति के हैं। सुखदेव बताते हैं गांव के 99 फीसदी लोग गांव से पलायन कर गए हैं , उनके खेत बंजर हो गए हैं व मकान क्षतिग्रस्त हो गये है।जो गांव में रह गए हैं वह हैं बुजुर्ग दंपति व अकेले बूढ़े लोग।

यह तो रही गांव के पलायन की बात , खुद सुखदेव ने पलायन नही किया । उन्होंने वर्ष 2012-13 में  उजड़ते हुए गांव को संवारने का काम शुरू किया और आज उन्होंने गांव से पलायन कर गए अपने परिवार के चाचा , ताऊ लोगों की सामूहिक खेती पर बगीचा लगाकर उसमें ताइवान के आड़ू,खुमानी,नारंगी,चेरी, कीवी ऐलोवेरा,अमेरिकन अबोकाडो जो सलाद के काम,अंजीर,दालचीनी,तेजपत्ता,देवदार जैसे हजारों फलदार व इमारती पेड़ लगाए हैं। और अब ये पौधे फल देने लगे हैं।

एलोवेरा से सुखदेव जैल बनाते हैं ,इस बार उन्होंने 50 हजार रुपये की कीवी भी बेची हैं
जिससे उनकी आर्थिक स्थिति भी ठीक हुई है। उन्हें आशा है कि अगले साल से लगभग सभी पौधे फल देना शुरू कर देंगे। उनकी अपनी स्वयं की पेयजल लाइन है, इस दौरान उन्हें किसी से भी मदद नही मिली , मात्र उद्यान विभाग से दो पोली हॉउस 80%व 50%छूट पर मिले । धीरे धीरे उन्होंने गांव की सामूहिक 70 से 80 नाली भूमि पर हर तरह के पेड़-पौधे लगाए हैं, जिसमें वे पहाड़ी दालों का भी उत्पादन कर रहे है।

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