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पहाड़ के आर्थिक विकास के लिए जरुरी हैं सुनियोजित और चरणबद्ध प्लानिंग की

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जब तक नीतियां सुनियोजित और चरणबद्ध तरीके से नही बनेंगी तब तक पहाड़वासियों की विकास की हसरतें परवान नहीं चढ़ पायेगी

मजबूत आर्थिकी के लिए जरुरी हैं पर्वतीय विकास कोष

दिलवर सिंह बिष्ट
रुद्रप्रयाग।”अभी सपने कश्ती में भरकर, साहिल तक पंहुचाने हैं।कुछ ख्वाब अभी अधूरे हैं,कुछ पृष्ठ लिखे जाने हैं।।लेखक एवं कवि राजीव बडोनी”मुसाफिर” की उपरोक्त पंक्तियां वर्तमान परिदृश्य में उत्तराखंड के लिए सटीक बैठती है। पिछले सात हफ़्तों से पहाड़ के ठप पड़े जनजीवन को अब पटरी पर लाने के लिये राज्य सरकार ने कमर कस ली है। कोविड-19 जहां सामाजिक बदलाव की नई इबारत लेकर आया है वंही अब सामाजिक जनचेतना व जागरूकता की आवश्यकता कहीं अधिक बढ़ गई है। इस नवीन चुनौती को हम सबको मिलकर सामना करना होगा। पिछले कुछ समय से सब कुछ रुक सा गया है,चाहे वह जीवन हो या गाड़ी का “चक्का” सभी”जाम”हो गये हैं । उत्तराखण्ड में जल,जंगल ,जमीन, मूलभूत आवश्यक्ताओं की यहां जीवन रेखा है। वंही पर्यटन व यातायात इसकी आर्थिकी की रीढ़ हैं। पिछले दो दशकों से विकास की हसरतें लिए पहाड़वासी जब पहाड़ चढ़ने की कोशिश करते हैं, तब तक कोई न कोई बाधा उनकी राह में रोड़ा बन जाती है।

लॉकडॉउन के कारण पहाड़ की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हो गई है, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी जरूरतों को लेकर पहाड़वासी अत्यंत चिंतित हैं, एक ओर जहाँ प्राकृतिक आपदाओं को झेलना पहाड़वासियों की नियति सी बन गई है, तो दूसरी ओर आर्थिक संसाधनों की नितांत कमी के कारण “पलायन”की समस्या बनी हुई है।

जब तक नीतियां सुनियोजित और चरणबद्ध तरीके से नही बनेंगी, तब तक पहाड़वासियों की विकास की हसरतें परवान नहीं चढ़ पायेगी।नीति निर्धारकों ने आज तक जो भी नीतियां उत्तराखंड बनने के बाद बनाई वे सभी पहाड़ी जिलों पर लागू ही नहीं हो सकती हैं। पहाड़वासियों की दुश्वारियों को कम करने के लिये उन्ही के अनुरूप नीतियों का सृजन होना चाहिये।

इस संदर्भ में हमने कुछ खास सख्सियतों से चर्चा कर उत्तराखण्ड के विकास और अर्थव्यवस्था पर राय जानी गई कि क्या पहाड़ में अब नये युग का सूत्रपात हो सकता है, तो सुनिए क्या कहते हैं हार्क के संस्थापक डॉ महेंद्र सिंह कुँवर व लेखक एवं कवि राजीव बडोनी “मुसाफिर” कहते हैं की उत्तराखण्ड राज्य के लिए अलग से ‘पर्वतीय विकास परिषद’ की स्थापना होनी चाहिये।जिसके लिए राज्य सरकार को प्रदेश से लेकर प्रत्येक ग्राम सभा के सदस्य को इस अभियान में शामिल करना होगा।उक्त परिषद का निश्चित कार्यकाल हो तथा प्रत्येक ग्राम सभा सदस्य से लेकर ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य,जिला पंचायत सदस्य,जिलाधिकारी, विधायक, सांसद, सामाजिक कार्यकर्ता, धरातल पर कार्य करने वाली स्वयं सेवी संस्थाएँ ,स्वयं सहायता समूह व आंगनबाड़ी आदि को जिम्मेदारीयां दी जाए ताकि निश्चित समय मे दिये गये और किये गये कार्य का मूल्यांकन हो सके।

“पर्वतीय विकास परिषद” की स्थापना का उद्देश्य पहाड़ में बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के अवसर तलाशना है।पलायन कैसे रोका जा सकता है इस पर विशेष ध्यान देना होगा, मैं और मेरे से ऊपर उठकर “हम”की भावना को विकसित करना होगा। पंच बद्री,पंच केदार और पंच प्रयागों के इस राज्य से बेहतर भविष्य तलाशना कदापि नामुमकिन तो नही है। प्रदेश व सरकार को पहाड़ की नीति पहाड़ के अनुकूल बनानी होगी। यहां युवाओं को पर्याप्त भागीदारी देनी होगी।

विकास के सोपान को छूने के लिए महिलाओं यानी नारी शक्ति को प्रथम पंक्ति में खड़ा करना होगा, क्योंकि पहाड़ की नारियां काफी संघर्षशील और जुझारू व्यक्तित्व लेकर सफलता की ओर आगे बढ़ती हैं इसके साथ ही पहाड़ की मूलभूत सम्पदा जल,जंगल और जमीन के संरक्षण के लिये अलग से हिमालयन नीति बननी चाहिये। साथ ही “पर्वतीय विकास कोष” की भी स्थापना होनी चाहिए जिसमें जिसकी जितनी श्रद्धा हो पहाड़ के विकास के लिए योगदान दे सकता है।यदि इस सोच को लेकर आगे बढ़ा जायेगा तो पहाड़ के दिन बहुरेंगे इसमें दो राय नही है। पहाड़ी उत्पादों के वाजिब दाम न केवल मिलेंगे बल्कि उनके विपणन की कारगर ब्यवस्था होगी और स्वरोजगार के साधन सृजित होंगे ऐसी हमारी अपेक्षा और उम्मीद है। उत्तराखंड में अभी भी पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं , जिन्हे सामने आगे लाने की जरुरत हैं , अभी तक पर्यटक केवल जानी पहचानी जगहों तक ही जा पाता हैं,पर्वतीय विकास कोष बनने के बाद इसमें पर्यटन के गति मिलेगी , व युवाओं को रोजगार से जोड़ा जा सकेगा , व पलायन को रोका जा सकेगा ।

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