Home Narendra Aswal Singer लोक गायक नरेन्द्र सिंह असवाल के संघर्ष की कहानी

लोक गायक नरेन्द्र सिंह असवाल के संघर्ष की कहानी

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दिलबर सिंह बिष्ट
रुद्रप्रयाग। यदि आपके अंदर कुछ कर गुजरने की प्रतिभा व ललक हो और अपनी संस्कृति के लिए कुछ करने की इच्छा हो , तो मनुष्य चाहे सात समुन्दर पार भी क्यूँ न चला जाय वो वहाँ भी उसे नहीं छोड़ता।इसी कसौटी पर खरा उतरा रुद्रप्रयाग के ग्राम शिवपुरी पट्टी बचन्स्यु निवाशी लोक गायक नरेन्द्र सिंह असवाल । अपने परिवार के पालन पोषण के लिए 26 वर्ष पूर्व नरेन्द्र सिंह असवाल दिल्ली पहुंचे वहाँ वे अपने किसी परिचित के साथ गये ।दिल्ली आने के बाद उन्होंने रोजी रोटी चलाने के लिए लक्ष्मीनगर के विजय चौक स्थित क्लॉथ पैलेस मैं एक कपड़ो की दुकान में नौकरी शुरू की , आज भी उसी दुकान में नोकरी कर रहे है ।

नरेंद्र असवाल बताते है कि सुरवाती दौर से उन्हें दिल्ली में अपनी संस्कृति के प्रति कुछ लिखने व दिल्ली में रहने वाले गढ़वाली भाई बंधुओं को अपनी संस्कृति को जानने ,बोली भाषा को एक दूसरे को जानने के लिए स्टेज शो किए, लेकिन सफलता उतनी नहीं मिली , इसके बाद उन्होंने पीछे मुड कर नहीं देखा और गढ़वाली गानों को लिख कर खुद ही उसे अपनी आवाज दी , परिणाम अब तक नरेंद्र असवाल की 11 एलबम आ चुकी हैं , जिसमें खेरी का दिन,तांबा सारी ढ़ोल, नटखट गोपाल,सोंज्डया समोदरा, बौजी सतेस्वरी, देणा होंया नागराज ,प्यारु बचन्स्यु व जागर मा हरियाली देवी निकाल चुके है।

व्यथित मन से लोक गायक नरेन्द्र असवाल कहते है यदि उत्तराखंड की सरकारों ने अपनी लोक संस्कृति पर काम कर रहे छोटे व बड़े कलाकारों को आर्थिक रूप से मदद , की होती तो पहाड़ के कलाकारों के इस प्रकार से दर दर नहीं भटकना पड़ता । वह कहते है हमारी पहाड़ी संस्कृति को आगे बढ़ाने में उन्हें गायन हो या स्टेज सो करना पड़े इसके लिये वह जीवंत पर्यन्त संघर्ष करते रहेंगे।

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