Home RESERVATION IN PERMOTION सरकारी विभागों में अब बिना आरक्षण के ही पदोन्नतियां होंगी। हड़ताल ख़त्म

सरकारी विभागों में अब बिना आरक्षण के ही पदोन्नतियां होंगी। हड़ताल ख़त्म

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राजसत्ता न्यूज़ ब्यूरो

देहरादून : उत्तराखंड सरकार ने प्रमोशन पर रोक हटा दी है। इसके तहत जल्द शासनादेश जारी होगा। राज्य में अब सितंबर, 2012 के शासनादेश पर वरिष्ठता के आधार पर पदोन्नतियां होंगी। भाजपा सरकार ने जनरल ओबीसी संगठन के पक्ष में हड़ताल पर गए कर्मचारियों की सभी मांगें मान ली है। गौरतलब हैं कि जनरल और ओबीसी संगठन कर्मचारी प्रमोशन पर लगी रोक हटाने की मांग को लेकर दो हफ्ते से ज्यादा समय से बेमियादी हड़तालपर थे।

क्या था सात फरवरी 2020 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला , जिसको आधार बनाकर हड़ताल इतने दिनों तक चली ।सुप्रीम कोर्ट का आदेश: संविधान के अनुच्छेद 16 (4-ए) के तहत प्रदेश सरकार आरक्षण देने अथवा नहीं देने को लेकर स्वतंत्र है। कोई भी न्यायालय उसे प्रमोशन में आरक्षण को लेकर आदेश नहीं दे सकता।

सात फरवरी 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में उत्‍तराखंड होइकोर्ट के एक आदेश को पलट दिया था। सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने इस बात को साफ़ कर दिया था कि प्रमोशन में आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है ,और राज्य को इसके लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही यह भी टिप्‍पणी की कि एसटी-एसटी समुदाय का सरकारी नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है तो वह नौकरियों एवं प्रमोशन में आरक्षण देने का कानून बना सकती है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उत्तराखंड के एससी-एसटी कर्मचारी उग्र हो गए और उन्‍होंने आंदोलन शुरू कर दिया। सरकार के आश्‍वासन के बाद वे तो शांत हो गए परन्तु जनरल-और ओबीसी कर्मचारियों ने आंदोलन की राह पकड़ ली।

क्या था विवाद

पांच सितंबर 2012 को शासनादेश जारी हुआ, सरकार ने प्रदेश में प्रमोशन में आरक्षण पर रोक लगा दी।

उसी महीने यानि सितंबर 2012: रुद्रपुर निवासी ज्ञान चंद्र ने याचिका दायर कर सितंबर 2012 में कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में दिए गए शासनादेश को चुनौती दी।

02 Apr 2019: नैनीताल हाईकोर्ट ने उत्तराखंड सरकार के शासनादेश को निरस्त कर दिया। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन और न्यायमूर्ति एनएस धानिक की संयुक्त खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की। अलबत्ता, अदालत ने कहा कि सरकार चाहे तो इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 16 (4ए) के अंतर्गत कानून बना सकती है।

15 जुलाई 2019 को लोक निर्माण विभाग में जूनियर इंजीनियर से असिस्टेंट इंजीनियर (सिविल) के पद पर पदोन्नति में आरक्षण देने का निर्देश दिया था। साथ ही राज्य सरकार को लोक सेवा में एससी/एसटी समुदाय के पर्याप्त प्रतिनिधित्व से संबंधित परिणामात्मक डाटा जुटाने को कहा था।

इसी फैसले को सामान्य वर्ग के कर्मचारियों व राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट ने चुनौती दी थी। जिस पर फरबरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश:दिया कि संविधान के अनुच्छेद 16 (4-ए) के तहत प्रदेश सरकार आरक्षण देने अथवा नहीं देने को लेकर स्वतंत्र है। कोई भी न्यायालय उसे प्रमोशन में आरक्षण को लेकर आदेश नहीं दे सकता।

इससे पहले भी वर्ष 2006 में सुप्रीम कोर्ट के सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा था कि सरकार पदोन्नति में आरक्षण तब दे जब वह आंकड़े जुटा ले कि किस जाति के कितने लोग वंचित हैं। वंचित वर्गों का प्रतिनिधित्व कितना है और कितने पद रिक्त हैं। इसके बाद भी पदोन्नति में आरक्षण जारी रहने पर मामला पुन: कोर्ट पहुंचा था। तब कोर्ट ने 2011 में 1994 का यूपी का आरक्षण संबंधी एक्ट निरस्त कर दिया था।

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