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सियासत का अगर यही हाल रहा तो वो दिन दूर नहीं जब उत्तराखंड के भीतर ही पहाड़ी राज्य की मांग सिर उठाने लगेगी ।

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आखिर 20 साल में पहाड़ को क्या मिला , जलालत , बेरोजगारी , और न ही गैरसैण

राजेन्द्र बिष्ट 

गैरसैण: उत्तराखंड को पृथक राज्य बनाये जाने के संकल्प के साथ ही अस्तित्व में आई उत्तराखंड क्रांति दल के थिंक टैंक माने जाने वाले दिवंगत विपिन त्रिपाठी ने कहा था कि राजधानी के चयन में यदि राजनीतिक दबाव आया और गलत निर्णय लिया गया तो भविष्य में गम्भीर परिणाम होंगे। जो वर्तमान में नजर आने लगे है।

प्रचंड जनांदोलन व शहादतों के बाद मिले उत्तराखंड राज्य के निवासियों को लगा कि प्रदेश भय व भ्र्ष्टाचार से मुक्त होगा , लेकिन प्रदेश की स्थिति और भी गम्भीर हो गई। जनहित के तमाम मुद्दों को जहाँ हासिये पर धकेल दिया गया ,वही भ्रष्टाचार व कमीशनखोरी ने आम लोगों का जीना दुस्वार कर दिया हैं । शराब की पहुंच गांव- गांव हो गई। युवा नशे की गिरफ्त में हैं, बेरोजगारी निरन्तर बढ़ रही है। गांव के गांव खाली हो रहे हैं , जिसके चलते आज आम उत्तराखंडी स्वयं को ठगा महशूस कर रहा है।

3 अगस्त 1998 को केंद्र में तत्कालीन बीजेपी सरकार के मंत्रिमंडल ने उत्तरांचल राज्य के गठन को मंजूरी दी, जिस पर 7 दिसम्बर 1998 में राज्य विधेयक को हरी झंडी मिली व 1 अगस्त 2000 को लोकसभा व 10 अगस्त 2000 को राज्यसभा में प्रदेश गठन विधेयक पारित हुआ। जिस पर 28 अगस्त को राष्टति ने अधिसूचना जारी कर उत्तराखण्ड प्रदेश गठन का मार्ग प्रसस्त किया, और अंततः 9 नवम्बर 2000 को उत्तरांचल प्रदेश अस्तित्व में आया। सुरजीत सिंह बरनाला को सूबे का राज्यपाल व नित्यानंद स्वामी को मुख्यमंत्री बनाया गया।


इस बीच प्रदेश की राजधानी को लेकर पहाड़वासी खुश नहीं हीं थे, लिहाजा गैरसैंण को राजधानी बनाये जाने की मांग उठने लगी। प्रदेश के कोने कोने से आंदोलनकारी गैरसैंण आ कर प्रदर्शन , धरना व अनशन करते देखे गए, जिनका सरकार की सय पर पुलिसिया दमन होता रहा। किन्तु हासिल कुछ भी नहीं आया। हालत यह रही कि नैनीताल में बाबा मोहन उत्तराखंडी अनसन के दौरान प्रशासन की उपस्थिति में शहीद हो गए। जिसकी आज तक जांच नही हो सकी। वहीं 2 वर्ष पूर्व गैरसैंण राजधानी की मांग कर रहे 32 आंदोलनकारी आज भी कोर्ट कचहरी के चक्कर काट रहे है। आंदोलनकारियों के मुकदमे वापस करना तो दूर सरकार उनकी बात सुनने को भी तैयार नहीं है।

14 जनवरी 2013 को एक भब्य कार्यक्रम में तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहगुणा ने विधानसभा अध्यक्ष गोबिंद सिंह कुंजवाल व सांसद सतपाल महाराज की उपस्थिति में गैरसैंण के भराड़ीसैण में विधान सभा, ट्रांजिट हॉस्टल व विधायक आवास का शिलान्यास कर पहाड़वासियों को विश्वास में लेने का प्रयोग किया, किन्तु कांग्रेस के दिग्गज नेताओ में सुमार हरीश रावत व इंदिरा हृदयेश की अनुपस्थिति चर्चाओं में रही, जब कि तत्कालीन कृषि मंत्री हरक सिंह रावत भराड़ीसैण विधानसभा में मकड़ी के जाले लगने जैसी टिप्पणी करते सुने गए।

उसी कार्यक्रम में नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट ने गैरसैंण को ग्रीष्म कालीन राजधानी व जिला बनाये जाने की मांग करते सुने गए। राज्य में अब बिगत तीन साल से भाजपा सत्ता में है, उसका भी गैरसैण को राजधानी व जिला बनाने की मंशा अभी स्पस्ट नहीं दिखती । 20 साल के बाद भी अगर यही हाल रहा, तो वो दिन दूर नहीं जब उत्तराखंड के भीतर ही पहाड़ी राज्य की मांग सिर उठाने लगे।

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