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हिमालयन एक्शन रिसर्च सेंटर का कमाल ,स्थानीय अनाजों से बना रहा है खाद्य सामाग्री

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हार्क अब तक स्थानीय अनाजों से 25 किस्म की चॉक्लेट बना चुका हैं ।
पांच किस्म की चाय को बाजार में उतार चुका हैं ।

दिलवर सिंह बिष्ट
रुद्रप्रयाग। हीरे के बारे में एक कहावत हैं कि हीरे की असली परख सिर्फ बादशाह को होती है या फिर जोहरी को। लेकिन यहाँ तो कई बादशाह आए और चले गए ,लेकिन हीरा वही का वही बना हुआ हैं। कुदरत ने तो हम सब को हीरा ही बनाया बस शर्त ये है जो घिसेगा वही चमकेगा । आज हम एक ऐसे ही हीरे (शख्सियत) की बात कर रहे हैं जो किसी परिचय का मोहताज नहीं हैं , जिनके पास सभी सुख सुबिधाओं के होने के बाद भी उसने अपनी मातृभूमि को कर्मभूमि बनाकर लोगों की सेवा के लिए अर्पित किया हैं। कृषि से कैसे हम स्थानीय लोगों का पलायन रोक सकते हैं , पहाड़ी अनाजों ,आयुर्वेदिक तत्वों से युक्त जंगली कंदमूल ,फल, फूलों से उनका रस निकाल कर उसे आजीविका का साधन बनाया जा सकता हैं। ऐसी ही शख्सियत हैं डॉ महेंद्र कुँवर हैं।कुंवर ने 1989 में हिमालयन एक्शन रिसर्च सेंटर(हार्क) की स्थापना की , जिसका उद्देश्य मात्र पहाड़ी क्षेत्रों में होने वाले पलायन को रोकने व यंहा निवासरत लोगों को अपनी आजीविका के साथ -साथ कैसे इनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो के लिए काम कर रहे हैं ।

डॉ महेंद्र कुँवर उत्तराखंड के पहाड़ी, मैदानी क्षेत्रों में 40 साल में विभिन्न क्षेत्रों में 30 से अधिक कॉपरेटिव सोसायटी,कम्पनियाँ व किसान संगठन बनाये हैं जिनसे 1200 लोग जुड़े हुए हैं। हार्क के संस्थापक महेंद्र सिंह कुँवर का मकसद अपने स्थानीय आयुर्वेदिक औषधियों से युक्त अनाजों व जंगली कंदमूल फलों से प्राकृतिक शुद्ध खाद्य सामग्री बना कर लोगों को आत्मनिर्भर बनाना था । आज हार्क के माध्यम से विभिन्न कम्पनियाँ ,कॉपरेटिव सोसाइटी,किसान संगठन आंवले,काफल,स्थानीय आम,बुराँश जैसे फलों से जूस व अचार बना रहे हैं। इसी प्रकार स्थानीय अनाजों से 25 किस्म की चॉक्लेट व चार से पांच किस्म की चाय को बनाकर बाजार उतारा हैं।

डॉ महेंद्र सिंह कुँवर की ही सकारात्मक सोच का प्रतिफल है कि अलकनन्दा कृषि ब्यवसाय बहुउद्देश्यीय स्वायत्त सहकारिता जनपद चमोली के कालेस्वर सहित अन्य स्थानों पर लगी आधुनिक मशीनों को महिलाएं ही चलाती हैं, जबकि शुरुवात में लोग इसके लिए महिलाओं को ठीक नहीं समझते थे ।

आज हार्क की अपनी मृदा परीक्षण प्रयोगशाला है जो नौगांव में अब तक 3571 मृदा नुमनो की जांच की जा चुकी है। जिस कारणअब तक इलाके के किसानो को 3171 मृदा कार्ड किसानों को दिये जा चुके हैं। डॉ महेंद्र सिंह कुँवर को उत्तराखण्ड के पिछड़े क्षेत्रों में सीमान्त किसानों के बीच कृषि ,प्रोद्योगिक ,एवं उत्पादकता बढ़ाने एवं स्थानीय संसाधनों का मूल्य संवर्धन कर किसानों के जीवन स्तर उठाने की दिशा में सतत योगदान के लिये गोपेश्वर में द्वितीय श्रीदेब सुमन विश्व विद्यालय उत्तराखंड के दीक्षांत समारोह में उन्हें डॉ ऑफ लिटरेचर(डी.लिट्)की मानद उपाधि से अलंकृत किया गया। साथ ही पर्यावरण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य के लिये उन्हें एन्विरोनमेन्ट एंड हेल्थ वारियर अवार्ड से 2019 में दिल्ली में आयोजित एक समारोह में नवाजा गया।

यूसेक के निदेशक डॉ महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट का कहना है कि उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रों में पलायन को रोकने,अपनी स्थानीय नाजों हो या जंगली कंदमूल फल फूलों व कृषि के माध्यम से लोगों को स्वावलंबन करना यह सबसे बड़ी चुनौती कहें या पहाड़ के प्रति पीड़ा व आत्मसमर्पण यह एक विरले ही कर सकते हैं, वह कहते हैं कि असली धरती पुत्र डॉ महेंद्र सिंह कुँवर है जो 40 साल से अनवरत पहाड़ में अपने अनाजों के स्तेमाल और ,पलायनको रोकने के साथ-साथ स्थानीय लोगो की आजीविका का भी बखूबी से ध्यान रख रहे हैं। डॉक्टर महेंद्र प्रताप का कहना हैं कि में व्यक्तिगत रूप से सरकार को अपने कृषि के क्षेत्र में किये गये 40 वर्षों के अनुभव का लाभ देना चाहता हूँ बशर्ते कि वे लेना चाहे।

डॉ महेंद्र सिंह कुँवर ने उत्तराखंड सरकार से अपील की हैं कि ऐसे लोगों को आगे लाना होगा जिन्होंने कृषि के क्षेत्र में काम किया हैं, अनुभवी लोगों को तबज्जो देकर आगे लाना होगा न कि अनुभवहीन लोगों को। सरकारों को जमीन से जुड़े जानकारों के अनुभव का फायदा उठाना चाहिए, इसके साथ ही उन्हें उच्च सम्मान से से भी नवाजा जाना चाहिए , जिससे कि प्रदेश को उनके अनुभवों का लाभ मिलता रहे।

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