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पंडिताई छूटी तो सूरजमुखी से सुधार ली ग्रह दशा

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भुवन भास्कर बवाड़ी

मानिला। दिल्ली से लौटे प्रवासी पूरन भट्ट ने दिखाई आत्मनिर्भर बनने की राह, असफलता के लिए करोना संक्रमण और लॉकडाउन का रोना रोने वाले तो बहुत हैं इनमें से कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने इस आपदा को अवसर बनाकर खुद के लिए नहीं मंजिल तय की और समय रहते मुकाम भी हासिल कर लिया।

उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के सल्ट ब्लॉक क्षेत्र के कुड़ीधार निवासी पूरन भट्ट की कहानी भी कुछ जुदा ही है पंडित जी करीब 20 वर्षों से दिल्ली गुरुग्राम वह नोएडा में धार्मिक अनुष्ठान व कथा वाचन करते थे, यही उनकी आजीविका का आधार था। वैश्विक महामारी के कारण लॉकडाउन में धार्मिक कार्य भी ठप हो गए। पूरन भट्ट मायूस हुए पर उन्होंने हौसला टूटने नहीं दिया, अन्य प्रवासियों की तरह उन्होंने भी दिल्ली छोड़ दी।


गांव लौटे 14 दिन की क्वारंटाइन में रहे और पहाड़ में जंगली जानवरों से खेती को होने वाले नुकसान से छुटकारा पा कुछ नया कर गुजरने की ठानी, क्वारंटाइन अवधि पूरी करते ही बंजर पड़े अपने खेतो में सूर्यमुखी के बीज बोए।

महीने भर में ही खेतों में फूल खिलने लगे , उन्हीं खेतों में उन्होंने हाथ मधुमक्खी पालन के लिए सूरजमुखी से खिल उठे खेतों के बीच मधुमक्खियों के लिए डब्बे रखे ।अब उनका अगला लक्ष्य सूरजमुखी के बीज से तेल निकालना और मौन पालन से नई शुरुआत करना है । अगर बात करें उनकी तो उन्होंने अपनी पांच एकड़ में सूरजमुखी की खेती से करीब 1 कुंटल उत्पादन की उम्मीद है पहली बार प्रयोग किया जो सफल रहा । राज्य सरकार ने मदद की तो सूर्यमुखी का तेल निकालने के लिए मशीन घर पर ही लाऊंगा यह पूरन भट्ट का के कहना है। फिलहाल पर्वतीय जैविक उत्पाद के रूप में दिल्ली तक पहुंचाने की योजना भी बना रहे हैं।

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