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सीमित संसाधनों के बीच बड़ी संख्या में उत्तराखंड लौट रहे प्रवासी हैं, त्रिवेंद्र सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती

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राकेश चंद्र डंडरियाल

देहरादून : कोरोना से जूझते उत्तराखंड की सरकार के लिए अगर सबसे बड़ी चुनौती है, तो वो हैं , देश के बिभिन्न प्रदेशों से लौटे प्रवासी । आकड़ों के मुताबिक फिलहाल जिन जिलों से सबसे ज्यादा पलायन हुआ था , उन्ही जिलों में सबसे ज्यादा प्रवासी अपने गांव को लौटे हैं। इनमें ज्यादातर लोग होटलों , रेस्टोरेंटो , चाय की दूकान , मॉल, दुकानों,सिनेमा इत्यादि में काम करने वाले हैं , और निकट भविष्य में कम से कम एक साल तक तो इन्हे अपने ही गांव में रहकर जीवन यापन करना होगा । पौड़ी गढ़वाल और अल्मोड़ा में सबसे ज्यादा लोगों ने वापसी की हैं। हालांकि अब पहाड़ लौटने की स्पीड कुछ कम हो गयी हैं , चार अप्रैल तक बाहरी राज्यों से उत्तराखंड आने के लिए दो लाख 70 हजार से ज्यादा लोगों ने ऑनलाइन रजिस्ट्रेश करवाया था।

राज्य में अब तक लगभग एक लाख 95 हजार से ज्यादा लोग वापस आ चुके हैं। सेंटर फॉर मोनेटरिंग इंडियन इकॉनमी (CMIE) के अनुसार प्रदेश में बेरोजगारी का स्तर मई तक आठ फ़ीसदी तक पहुंच गया हैं , अब प्रवासियों की प्रदेश वापसी के बाद इसमें भरी बृद्धि होनी की संभावना हैं। कोरोना संकट के चलते लागू लॉकडाउन ने राज्य की आर्थिक कमर तोड़ दी है। पिछले ढाई महीने से राजस्व वसूली नाममात्र की हो रही हैं ,सरकारी महकमों के तमाम खर्चो , नए रोजगार पर सरकार ने रोक लगा दी गई हैं , प्रदेश की माली हालत खराब हैं।

वापस लौट रहे प्रवासियों के लिये उत्तराखंड सरकार ने रोजगार, आवास जैसी मूलभूत आवश्यकताओं पर काम करना शुरू कर दिया हैं , लेकिन राज्य की नौकरशाही व पुराने कानून इसमें लगातार अड़ंगे अटका रहे हैं। मसलन मुख्यमंत्री रोजगार योजना के पोर्टल की ही बात करें तो कुछ भी कर लो आपका रजिस्ट्रेशन होना संभव नहीं हैं। अल्मोड़ा जिले के पोर्टल पर लगे अधिकतर अधिकारियों के लैंडलाइन नंबर पहुंच से परे हैं , किसी अधिकारी का अगर नंबर लेना हैं तो आपको डीएम को ऑफिस से ही संपर्क करके उपलब्ध हो सकता हैं। कृषि योजनाएं बाबा आदम के ज़माने की हैं , कृषि जोत का साइज कम होनें के कारण आम जन इसका फायदा उठाने में असमर्थ हैं, क्योँकि जितनी भूमि योजना के हिसाब से चाहिए , उतनी कृषि भूमि पहाड़ में एक सामने किसी के भी पास नहीं हैं। चकबंदी इसका आधार बन सकता हैं ,अतः नीतियों में पहाड़ के हिसाब से परिवर्तन जरुरी है।

दिल्ली से लगभग 75 हजार से ज्यादा प्रवासी पहाड़ का रुख कर चुके हैं. हरियाणा से 27 हजार से ज्यादा, राजस्थान से 9 हजार, गुजरात से 8 हजार और महाराष्ट्र से 13 हजार से ज्यादा प्रवासी लौटे हैं।. वहीं यूपी से 29 हजार से ज्यादा प्रवासी वापस आये हैं। जाहिर है इनके लिए सरकार को पूरे इंतजाम, मशलन खाने के लिए राशन , दाल , चीनी ,चावल , आटा इत्यादि की जरुरत पड़ेगी , सरकार ने सबसे बढ़िया सकारत्मक कदम ये उठाया हैं कि अपने इलाकों में पहुंचने वालों को राशन दिया जा रहा हैं , चाहे उसके पास राशन कार्ड है या नहीं । कई जगहों पर अधिकारीयों की काजगी अड़ंगेबाजी भी सामने आ रही हैं , लेकिन ऐसे मामले कम हैं।

क्या होना चाहिए सरकार का अगला कदम , अगले कदम के रूप में सरकार को उत्तराखंड लौटे लोगों के लिए ब्लॉक स्तर पर काम करना होगा , जो लोग जिस व्यवसाय से जुड़े हैं उन्हें उनके मुताबिक काम करने के लिए कार्ययोजना बनानी होगी । ज्यादातर लोग ऑर्गनिक खेती के लिए तैयार हैं , उनको कृषि सम्बन्धी , तकनीक दी जानी चाहिए , खासकर कृषि के लिए उन्नत बीज और यन्त्र , सेब , खुमानी , आड़ू की आधुनिक तकनीक को बिकसित किया जाना चाहिए । ये काम सिंगल विंडो जैसे फिल्म बिभाग में सरकार ने किया हैं उसी तर्ज पर होनी चाहिए।

सरकार को यह भी समझना होगा कि माइग्रेट होकर अपने प्रदेश लौटे इन लोगों को उसे सभी सुबिधाओं से लैस करना होगा , क्योंकि इस समय उनकी स्थिति ठीक नहीं हैं , अगर सरकार ने उनकी सहायता की तो 2022 के विधानसभा चुनावों में इन प्रवासिओं की अहमियत बहुत ज्यादा होगी , ये किसी भी इलाके के चुनावी समीकरणों व परिणामों को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

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