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एक अदद राशन कार्ड की कीमत तुम क्या जानो अल्मोड़ा में बैठे बाबू। राशन कार्डो का नवीनीकरण आसान नहीं।

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शपथ पत्र की बाध्यता को समाप्त किया जाय/स्व घोषणा को ही क्यों न मान लिया जाय शपथ पत्र ।

राकेश डंडरियाल/संजय कुमार अग्रवाल

अल्मोड़ा। लोकतंत्र में एक कहावत है ,जनता की सरकार जनता के लिए। लेकिन जब सरकार जनता के लिए मजबूती बन जाए तो जनता को बागी होने में में समय नहीं लगता। देश में एक अगस्त से एक राष्ट्र-एक राशन कार्ड योजना 24 राज्यों/ संघ राज्यों में प्रभावी हो गयी है़। लेकिन ई सरकार का दावा करने वाली उत्तराखंड सरकार बुरी तरह इस मामले में बैकफुट पर दिखाई देती है। अल्मोड़ा जिले की अगर बात करें तो दावे तो खूब किए जा रहे हैं लेकिन जमीन पर दावों की हकीकत कुछ और ही है।
जिला प्रशासन ने सरकारी राशन विक्रेताओं के जरिए आम जनता के लिए राशन फार्म तो जारी कर दिए है, लेकिन नवीनीकरण की अंतिम तारीख क्या होगी, ना तो राशन विक्रेताओं को पता है और न ही फूड इंस्पेक्टर को। ऊपर से करोना का संकट।

राशन कार्डों के नवानीकरण के साथ इतना तामझाम जोड़ दिया गया है कि बॉर्डर इलाके की जनता के लिए ये काम चने चबाने जैसा है। सबसे पहले राशन फार्म के साथ आय प्रमाणपत्र भी जमा करना है, जो अधिकारी इसे जारी करेगा वो आजकल ढूंढ कर भी नहीं मिल रहे हैं। तो ऑनलाइन प्रमाणपत्र एक मात्र विकल्प है, जो पढ़े लिखो के लिए तो आशान है लेकिन पुराने वा अशिक्षित लोगों के लिए काली भैंस के सामान है। लिहाजा काम आसान नहीं , इस काम के लिए उनको कम से कम ढाई सौ रुपए देने पड़ रहे हैं। इन्टरनेट कैफे वाले चांदी काट रहे हैं । सर्टिफिकेट की कोई गारंटी नहीं है। इस प्रमाणपत्र के साथ दूसरी मुसीबत है एफिडेविट ,अब एफिडेविट कैसे बने वहां भी लूट है। लिहाजा ग्रामीणों को पचास से सत्तर किलोमीटर दूर जाकर वहां से ढाई सौ का एफिडेविट बनवाना पढ़ रहा है। सवाल उठता है क्या जिले का खाद्य विभाग जनता से उनका हस्तलिखित सपथ पत्र नहीं ले सकती? अगर भविष्य में कोई त्रुटि पाई जाती है तो क्यों नहीं सेल्फ डिक्लेरेशन को ही सपथ पत्र मान लिया जाय। क्यों नहीं जिले के दुरस्त इलाकों में अधिकारी राशन कार्ड बनवाने में जनता की सहायता करें।
आइए , अब आपको रूबरू करवाते है स्याल्दे ब्लॉक के गढ़वाल बॉर्डर से लगे इलाकों का ,जहां हाल बुरा है। जनता पशोपेश में है। लेकिन सरकारी तंत्र मस्त। क्या जाता है उनका। उन्हें क्या लेना है जनता से।महीने की पगार तो आ ही रही है। अल्मोड़ा के पड़ोसी जिले के जिलाधिकारी ने हाल ही में सरकारी तंत्र को कहा है कि गांव गांव जाकर कैंप लगाकर अधिकारी लोगों के कार्ड बनाने में सहायता करें। लेकिन गढ़वाल बॉर्डर से जुड़े दर्जनों गांव ईखुरोला, मठखानी, मल्लालखोरा, गीवाईपानी, बजरखोड़ा, काफलगांव , मंगरुखाल, सुवाघोल, बाजवाड इलाकों के लोग परेशान है। इनके पास न तो को अधिकारी आते है और ना ही इन लोगों को इस बारे में जानकारी है।


एक और हकीकत देखिए, जब ये संवाददाता राशन की दुकान पर गया तो पाया कि जो फार्म जनता को दिए गए हैं उनमें उनकी जन्म तिथि व महीना सब एक ही है। ये कमाल शायद ठेकेदार का है। लेकिन अधिकारियों की भी जिम्मेवारी कुछ बनती है। विश्वास ना हो तो देख लीजिए।

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