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हाल उत्तराखंड कृषि बिभाग की वेबसाइट का ,आखिर क्या औचित्य हैं इसे चलाने का, जब किसानों को सूचनाओं ने मिलना ही नहीं हैं तो ?

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राकेश चंद्र डंडरियाल

देहरादून । किसानों की इनकम बढ़ाने के लिए एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रतिबद्ध हैं , तो दूसरी तरफ उत्तराखंड का कृषि बिभाग मानो उन्हें चूना लगाने के लिए तैयार बैठा हैं ,हाल यह हैं कि लाखों रुपये खर्च करने पर भी कृषि बिभाग की वेबसाइट पर न जाने किस ज़माने की सूचनाएं उपलब्ध हैं , राजसत्ता न्यूज़ ने जब इस बाबत बिभाग के डायरेक्टर गौरी शंकर से बात की तो उनका कहना था कि उन्हें नहीं पता हैं कि राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र की टीम ही इसे अपडेट करती हैं , बाकी इसके बारे में उन्हें कुछ पता नहीं हैं। शब्दों से प्रतीत होती हैं इन महाशय की अपने बिभाग के प्रति प्रतिबद्धता ।

तो क्या ये अधिकारी बिभाग में बड़े पदों पर बैठकर केवल कुर्सी तोड़ने के लिए हैं ? या राज्य के प्रति इनकी कोई जिम्मेवारी भी हैं ? केंद्र सरकार व राज्य सरकार ने किसानो व बेरोजगारों के लिए कृषि की कई योजनाएं जारी की हैं लेकिन उत्तराखंड के कृषि मंत्रालय की वेबसाइट पर बस अगर कोई सूचना उपलब्ध हैं तो वह हैं बाबा आदम के ज़माने की।

अब बात करते हैं इस बिभाग के सुपरफास्ट मंत्री सुबोध उनियाल की , कृषि कार्यों के लिए इतने समर्पित हो गए हैं कि इन्हे पिछले साढ़े तीन साल से अपने मंत्रालय की वेब साइट को देखने तक का समय नहीं मिल पाया । वैसे तो अधिकारियों को हड़काते रहते हैं लेकिन शायद वेब साइट की जानकारी इन्हें गलती से भी पता नहीं हैं , तभी तो ऐसा खेल चल रहा हैं। इस वेब साइट की अगर बात करें तो कृषि सांख्यिकी की अगर बात करें तो बर्ष 2015 -16 तक का ही डाटा उपलब्ध हैं , किसानो के लिए क्या नई योजनाएं हैं , कोई जिक्र नहीं। स्वायल हेल्थ कार्ड स्कीम , कोई जानकारी नहीं , प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का कही जिक्र तक नहीं। राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र की भी भूमिका भी पाक साफ़ नहीं हैं , क्या वह केंद्र द्वारा किसानों के लिए जारी की गई योजनाओं को नहीं जानता ? और अगर नहीं तो क्योँ बिठाया गया हैं ऐसे नाम के सइंटिस्टों को ऐसे स्थानों पर।

उत्तराखंड कृषि मंत्रालय की इस वेब साइट पर आपको बर्ष 2019 – 20 की कोई भी सूचना नहीं मिलेगी। न ही कोई प्रेस रिलीज़ , सवाल इस बात का हैं कि राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र को प्रदेश की सभी वेब साइटों को अपडेट करने के एवज लाखों रुपये की भरी भरकम राशि दी जाती हैं , अगर यहां आम किसान को सूचनाओं ने ही नहीं मिलना हैं तो क्योँ न इसे बंद कर दिया जाए। या जो विभाग के अधिकारी हैं क्योँ न उन्हें दण्डित किया जाए । जिन्हे यह भी पता नहीं हैं कि उनके बिभाग की वेबसाइट को कौन अपडेट करता हैं ?

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