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महिलाओं के जज्बे को सलामः ट्रेक्टर चलाकर कई दशकों से बंजर पड़ी खेती पर लगाए पेड़

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भुवन भास्कर वबाड़ी

मानिला। कोरोना ने भले ही पूरी दुनियां की अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया हो, चाहे कई लोगों ने इस दौरान अपनी नौकरियां गवांई हों, लेकिन इसी संकट के समय कुछ लोग इसे अवसर में भी बदलने लगे। संकट को अवसर में बदलने का एक ऐसा ही प्रयास किया है अल्मोड़ा के भिक्यासैन तहसील के ग्राम बवाड़ी किचार के लोगों ने।

कहते हैं कि अगर मन में कुछ ठान लो तो सब संभव है। कोरोना काल में शहरों से वापस लौटे गांव के कुछ युवकों ने खेती में कुछ नया करने की ठानी। सबसे पहले इन्होंने 25 साल से भी ज्यादा समय से बंजर पड़ी खेती में चदन, पीपल, आम, नींबू, सेव, संतरे के पेड-पौधे लगाए। इसके बाद इन्होंने गांववालों की ही मदद से बंजर पड़े खेतों की जुताई की। खेतों की जुताई छोटे साइज के ट्रेक्टर से की गई। खास बात यह रही कि जिन महिलाओं के हाथों में हमेशा दराती-कुदाल रहती थी वे भी इस ट्रेक्टर को बखूबी चला पा रही हैं , मतलब साफ था कि नवयुवकों को गांव की महिलाओं का भी भरपूर सहयोग मिल रहा था।

कुछ नया करने की लालसा सबसे पहले फरीदाबाद से गांव लौटे नवयुवक नीरज बवाडी के मन में आई। नीरज ने गांव के बड़े-बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों को अपनी प्लानिंग बताई। उनकी योजना में शामिल था- बंजर खेतों की बहाली, व्यवसायिक कृषि की जागृति
, प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग
, ग्रामीणों युवाओं को स्वरोजगार के प्रति जागरूक करना
। उन्होंने अपने प्रोजक्ट को ‘प्रोजक्ट सांगैर’ नाम दिया। दरअसल यह उनके खेत का ही नाम है।

नीरज के प्रोजक्ट में सभी गांववासियों ने हाथ बटाना शुरु कर किया। यहां तक कि उनके प्रयासों को ग्राम प्रधान किशोर बवाड़ी, बीडीसी सदस्य ललित मोहन बवाड़ी का भी उन्हें भरपूर सहयोग मिला। अब नीरज की प्लानिंग जमीनी स्तर पर दिखने लगी थी।

इसके बाद नीरज ने उद्यान विभाग के अधिकारियों को अपने गांव बुलाकर लोगों का उत्साहवर्धन किया। अधिकारियों ने भी गांव के लोगों को व्यावसायिक खेती के बारे में बताया। नतीजतन आज ग्राम बवाडी किचार आसपास के गांवों के लिए एक मिसाल बनता जा रहा है। पास के गांव ढया किचार के लोगों ने भी अपनी बंजर खेती में फलों के पेड लगाने शुरु कर दिए हैं।

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