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आखिर तोक सिस्टम से उत्तराखंड की जनता को कब मिलेगी मुक्ति ,विकास पर भारी तोक

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राकेश डंडरियाल

देहरादून। आजाद भारत से अंग्रेज बिदा तो हो गए लेकिन उनकी दी हुई विरासत आज भी जारी है। देश को आजादी मिले हुए इस पंद्रह अगस्त को 73 साल पूरे हो जाएंगे। पर क्या सच्चे मायने में गांव को आजादी मिल पाई है? आज भी अंग्रेजों का सिस्टम जारी है ,और वह है तोक सिस्टम। आजादी के बाद कई हुकूमते आ आई और चली गई, किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया। वर्तमान उत्तराखंड ने 53 साल तक उत्तर प्रदेश की उपेक्षा का भार सहा। आंदोलनों के बाद आखिरकार उत्तरप्रदेश से मुक्ति मिली, इस आधार पर कि उत्तराखंड को विकास के पंख लगेंगे। लेकिन बीस साल गुजरने के बाद भी विकास का पंछी शायद पहाड़ियों की तरह उत्तराखंड की मनमहोक वादियों को छोड़कर कहीं और चला गया।
अब विकास हो तो हो कैसे, पर्वतीय इलाकों के आधे से अधिक गांव तो तोक सिस्टम के कारण विकास की प्रक्रिया से दूर हैं। किसी भी ग्राम पंचायत को मिलने वाली विकास की राशि राजस्व रिकार्ड के हिसाब से उसी गांव पर लग जाती है जिसका रेवेन्यू रिकार्ड में नाम है। तोक को पंचायत के प्रधान ,सरपंच लोग अनदेखा कर देते हैं। उदहारण के लिए कई साल पहले ग्राम घटबगड़ की जनता ने एक प्राइमरी स्कूल को अपने गांव में खोलने के लिए सरकार से मांग की। स्कूल मिल भी गया। अब यहां से शुरू होती है तोक की लड़ाई, दरअसल घड़बगड़ का नाम रेवेन्यू रिकार्ड में है ही नहीं, वह बज्रखोड़ा गांव का ही एक तोक है, लिहाजा बज्रखोड़ा का कहना था कि स्कूल हमें मिला है, घटबगड को नहीं, शुरू हो गई लड़ाई। कई दिनों तक चलती रही, आखिरकार लड़ाई इस कदर खतरनाक मोड़ पर पहुंच गई कि एक गांव के लोग दूसरे गांव के लोगों के खून करने को तैयार हो गए। खैर तत्कालीन विधायक रणजीत सिंह ने किसी तरह मामले को शांत करवाया, और दोनों गांव को एक एक प्राइमरी स्कूल दिलवा दिया।
उत्तराखंड के तेरह जिलों में से पहाड़ के अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर,पौड़ी गढ़वाल, रुद्रप्रयाग,चमोली, टिहरी का पूरा हाल यही है। यहां तोक वाले गावों की संख्या हजारों में है। ऐसा नहीं है कि जन प्रतिनिधियों को इस बात का पता न हो परन्तु जन मुद्दों की किसको फुरसत है।

देश में 1960 के बाद से भूमि बंदोबस्त नहीं हो पाया है। इधर उत्तराखंड में देहरादून को छोड़कर हर जगह वर्ष 1962-63 में अंतिम बार भू-बंदोबस्त हुआ था। उत्तराखंड राज्य के बनने के बाद भूमि बंदोबस्त को हर सरकार ने बेहद जरूरी तो माना, लेकिन इस पर पहल किसी ने भी नहीं की। उत्तराखंड में ज्यादातर जमीन गोल खातों में कैद है। हरीश रावत सरकार,तथा त्रिवेंद्र सरकार ने इस मसले पर जरूर कुछ कहा लेकिन रिजल्ट अभी तक सामने नहीं आ पाया है। सरकार की कोशिश है कि सभी खाते खतोनियों की डिजिटल कर दिया जाय, ड्रोन से वीडियोग्राफी की जाएगी। लेकिन सवाल अपनी जगह अभी भी खड़ा है। जब तक तोक सिस्टम को खत्म करके, तोक गांव को राजस्व रिकार्ड में गांव का नाम नहीं मिलेगा तब तक आगे बढ़ना मुश्किल है।
मसला जटिल तो है, लेकिन इच्छा शक्ति होना भी जरूरी है। वर्तमान त्रिवेंद्र सरकार अगर चाहे तो प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में फैले इस जंजाल से मुक्ति दिला सकती है। बस जरूरत है इच्छा शक्ति व आगे बढ़ने की।

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