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वर्किंग जर्नलिस्ट्स ऑफ इंडिया ने की DAVP की दो पॉलिसियों को तत्काल प्रभाव से रद्द करने की मांग

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संजय कुमार अग्रवाल

नई दिल्ली, अल्मोड़ा।देश के मीडियाकर्मियों के शीर्ष संगठन, वर्किंग जॉर्नलिस्ट ऑफ इंडिया, सम्बद्ध भारतीय मजदूर संघ, ने कोरोना महामारी कॉल व ज्यादातर राज्यो में जारी लॉकडाउन के दौरान ही केंद्र सरकार के सूचना व प्रसारण मंत्रालय के अधीन, DAVP विभाग द्वारा लायी गयी दो विज्ञापन नीतियों का सख्त विरोध करने का फैसला किया है। विभग की तरफ से एक पालिसी वेब मीडिया के लिये लायी गयी तो दूसरी प्रिंट मीडिया के लिये लायी गयी है। यूनियन का मानना है कि ये दोनों पॉलिसियों एक सुनियोजित योजना के तहत सिर्फ बड़े मीडिया घरानों को फायदा पहुंचाने के लिये लायी गई है।

यूनियन का आरोप है कि केंद्र सरकार के चंद अधिकारियों ने गांधी जी की विचारधारा को दरकिनार करते हुए, दो ऐसी पॉलिसियों को पेश किया, जिसका फायदा सिर्फ बड़े मीडिया घरानों को ही होगा। यूनियन की तरफ से इन दोनों पॉलिसियों के विरोध में देश के प्रधानमंत्री, देश के सूचना व प्रसारण मंत्री, चेयरमैन प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया व डी ए व पी के महानिदेशक को पत्र भेजे हैं, जिसमे दोनों पॉलिसियों पर रोक लगाने की मांग की गयी है। यूनियन की तरफ से ये पत्र राष्ट्रीय अध्यक्ष अनूप चौधरी, राष्ट्रीय महासचिव नरेंद्र भंडारी, व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री संजय कुमार उपाध्याय की तरफ से भेजे गए है।

हमारे साथी देशभर में कोरोना योद्धा की तरह से कार्य कर रहे है । इस बीमारी से कई पत्रकार अपने जीवन से हाथ भी धो चुके है। इस कार्यकाल के दौरान ज्यादातर मंत्रालयों व उनसे संबंधित विभागों में कामकाज रुका पड़ा है। जो भी जरूरी सरकारी कार्य है, वो निपटाए जा रहे है। केंद्र सरकार के सूचना व प्रसारण विभाग के अधीन, DAVP , विभाग , इन दिनों कुछ अति उत्साह में कार्य कर रहा है। बेहतर होता कि ये विभाग मीडियाकर्मियों के हितों को लेकर कोई कदम उठता । DAVP , के कुछ अधिकारियों ने कोरोना काल का फायदा उठाते हुए , इन्ही दिनों में मीडिया के किसी भी संगठन से बात किये बिना ही, 2 ऐसी पॉलिसियों लागू कर दी, जिसका फायदा सिर्फ बड़े मीडिया घरानों को ही होगा। पहले ही से कोरोना महामारी से संकटो के दौर से गुजर रहे मीडियाकर्मियों को , अपना कार्य को सुचारू रखने के लिये, कड़ी अग्नि परीक्षायों से गुजरना होगा ।

सूचना व प्रसारण मंत्रालय से जुड़े DAVP , विभाग हाल ही में पहले ऑनलाइन मीडिया को विज्ञापन देने के लिये नई पालिसी लेकर आया । ये पालिसी पहले से ही थी, पर मौजूदा केंद्र सरकार ने इसपर एक नई पालिसी लाने का फैसला लिया था। बरसो तक ऑनलाइन मीडिया से जुड़े पत्रकार उसका इंतजार करते रहे। अब कोरोना काल मे DAVP विभाग ऑनलाइन मीडिया की एक नई पालिसी लेकर आया है । ये पालिसी ऐसी है कि इसका फायदा सिर्फ बड़े मीडिया घरानों को ही हो सकता है। देश मे जगह जगह ऑनलाइन मीडिया से जुड़े पत्रकारो के लिये इसमे कुछ भी नही है । यूनियन, इस पालिसी पर तत्काल रोक लगाने की मांग करता है । समाचार पत्र संगठनों के बिना विचार विमर्श तथा भारतीय प्रेस परिषद् की बिना सहमति प्राप्त किये ही प्रिन्ट मीडिया विज्ञापन नीति 2020 डीएवीपी की वेबसाइट पर सीधे अपलोड कर 1 अगस्त 2020 से प्रभावी कर दिया गया है I इस विज्ञापन नीति में किये गए परिवर्तन सम्पूर्ण देश के लघु एवं मध्यम समाचार पत्रों को समाप्त किये जाने का सुनियोजित प्रयास है I नीति को बिना समुचित विचार विनिमय के देश व्यापी कोरोना महामारी संक्रमण अवधि में ही लागू कर प्रभावी कर देना स्वयमेव सरकार के समाचार पत्र विरोधी मानसिकता प्रदर्शित करता है I देश के लघु एवं मध्यम समाचार पत्र पूर्व विज्ञापन नीति 2016 व जीएसटी के प्रतिबन्धों के चलते भयंकर संकट की स्थितियों से गुजर रहे हैं I ऐसी स्थिति में परिवर्तित विज्ञापन नीति न केवल आपत्तिजनक है बल्कि अख़बारों पर बज्रपात के सामान है।
प्रिन्ट मीडिया विज्ञापन नीति 2020 पर निम्नलिखित विन्दुवार आपत्तियां
1.लघु समाचार पत्रों के लिए “ प्रिन्ट मीडिया विज्ञापन नीति 2016 ” में कुल बजट का 15% निर्धारित था जो अब कुल विज्ञापन साइज का 15% कर दिया गया है I इससे छोटे अखबारों को मिलने वाले 15% बजट का अब मात्र 1.5 से 2% ही मिलेगा I इसके पूर्व भी लघु व मध्यम समाचार पत्रों को विज्ञापन नीति 2016 में तय कुल बजट का क्रमशः 15% व 35% विज्ञापन नहीं प्राप्त हो रहा था I अतः प्रिन्ट मीडिया विज्ञापन नीति 2020 के विन्दु 12.1 के तहत किया गया परिवर्तन गम्भीर आपत्तिजनक है I
2.नवीन विज्ञापन नीति के विन्दु 7.6.2 के तहत दर अनुबन्ध की अवधि 2 वर्ष निर्धारित कर दी गयी है। इससे पहले जारी दर अनुबन्ध की अवधि 3 वर्ष थी। यद्यपि डीएवीपी द्वारा सूचीबद्ध सभी समाचार पत्र प्रत्येक वर्ष अगस्त-सितम्बर माह में नवीनतम वित्त वर्ष का विवरण निर्धारित प्रारूप प्रपत्र ऑनलाइन एवं भौतिक रूप से प्रेषित / प्रस्तुत करते हैं और 3 वर्ष के लिए जारी दर अनुबन्ध अवधि के दौरान विज्ञापन दरों में कोई वृद्धि नहीं अपेक्षित की जाती है तो ऐसे में दर अनुबन्ध की अवधि घटाना किसी भी दशा में उचित नहीं है, जबकि प्रसार संख्या में कमी आ जाने पर दरें घटाने का तत्काल व प्रसार संख्या में वृद्धि होने पर 1 जनवरी से दरें बढ़ाने का प्राविधान नीति के दूसरे अन्य विन्दुओं में विनिर्दिष्ट है 3.प्रिन्ट मीडिया विज्ञापन नीति 2020 के विन्दु 7.5.1 के तहत 25००० से ऊपर प्रसार संख्या वाले समाचार पत्रों के लिए आरएन आई/ पीआईबी/ एबीसी से प्रसार संख्या की जांच करने की अनिवार्यता की गयी है I यह परिवर्तन भी बेहद आपत्तिजनक है I आरएनआई/ पी आई बी कार्यालय में विज्ञापन नीति 2016 के अनुसार प्रसार दावे की जांच के लिए समाचार पत्रों के अनेकों आवेदन पत्र आज भी लंबित पड़े हुए हैं I आरएनआई आगामी महीनों में प्रसार संख्या के दावों की जांच करने में असमर्थता व्यक्त कर चूका है और पुराने जारी किये गए प्रसार संख्या प्रमाण पत्रों को एक वर्ष के लिए विस्तारित करके अधिमान्य कर चूका है I ऐसे में डीएवीपी द्वारा सूचीबद्ध तीन चार हजार समाचार पत्रों को आर एन आई/ पीआईबी से प्रसार संख्या की जांच के लिए विवश/ बाध्य करना, इनको प्रताड़ित कर प्रेस की स्वतंत्रता को प्रतिबन्धित करने का एक सुनियोजित प्रयास है I
4.विगत अनेकों वर्षों के आंकड़ों से स्वतः स्पष्ट है कि लघु व माध्यम समाचार पत्रों को प्रिन्ट मीडिया विज्ञापन नीति 2016 में निर्धारित कुल विज्ञापन बजट का क्रमशः 15% व 35%विज्ञापन नहीं प्राप्त हो रहा है I अनेकों शिकायतों एवं सुझावों के बावजूद भी स्थिति ज्यों की त्यों ही है I सरकार का दायित्व है कि वह अपनी नीति से सभी को समानता का अवसर प्रदान कर नीति निर्धारित उनके अधिमान्य हितों की रक्षा करे I पूर्व नीति में विनिर्धारित नियमों के अनुसार सम्बंधित सभी समाचार पत्रों के हितों का संरक्षण सुनिश्चित किये बिना दूसरी नयी नीति बनाकर अचानक लागु करना सरासर अनुचित एवं विधिविहित प्राविधानों के सर्वथा प्रतिकूल है।

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